ग्रामीण भारत में पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा एवं पत्रकारिता की चुनौतियां पत्रकार यदुवंशी ननकू यादव

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ग्रामीण भारत में पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा एवं पत्रकारिता की चुनौतियां
वैसे, कहा जाए तो पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है और मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी चुनौतियां हैं। अगर आप पत्रकारिता के गर्भ में जाकर ग्रामीण भारत की पत्रकारिता को टटोलने की कोशिश करेंगे तो चुनौतियों का भंडार आपके सामने होगा। ग्रामीण पत्रकारिता ऊपर से जितनी आसान दिखती है, अंदर से उतनी ही कठिन है। वर्तमान में समय के साथ-साथ ग्रामीण पत्रकारिता को थोड़ा नाम तो मिला, लेकिन संसाधनों की कमी से ग्रामीण पत्रकार जूझते रह गए।

ग्रामीण इलाकों मे पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह(वेतन) है। जिसके चलते इन पत्रकारों को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। इस लिए ग्राम के जो भी लोग पत्रकारिता से जुड़े होते हैं, वे अपनी आय के दूसरे स्रोत खोजते हैं ताकि परिवार का खर्च चलाने में मुश्किलें ना आएं। ऐसे कहने को तो पत्रकारिता को देश का चौथा स्तंभ माना जाता है, किंतु पत्रकारों को जिस प्रकार की असुविधा का सामना करना पड़ता है उससे ना तो देश मज़बूत होगा और ना ही पत्रकारों का परिवार, आएंगी तो सिर्फ सामाजिक सुरक्षा की दरारें।

कम वेतन, सामाजिक सुरक्षा एवं राजनीतिक दवाब के कारण समाप्त होती स्वतंत्रता
रूरल जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के अनुसार ” ग्रामीण पत्रकारों को रोजाना 100 से 200 रूपये मिलते हैं”। जिससे उनका गुजर-बसर नहीं हो पाता है तो कथित तौर पर यह साफ है की वे किराना, खेती जैसे अन्य आजीविका के साधनों पर निर्भर रहते हैं। मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त और भारत के ग्राम पत्रकारिता के जाने माने विश्लेषक एवं पत्रकार पी. साईंनाथ भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं।

उनके कहे मुताबिक ” ग्राम पत्रकारों को काफी कम वेतन प्राप्त होता है ” जिसकी वजह से उन पर दबाव ज़्यादा होता है। पत्रकार संगठनों की कमी और कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरी के चलते पत्रकारों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है।

ग्राम पत्रकारों के लिए तनख्वाह के बाद सबसे ज़रूरी मुद्दा है सुरक्षा, जो उनकी चुनौतियों को दोगुना बढ़ा देता है। सभी ग्राम पत्रकारों के अलग-अलग स्थानीय राजनीतिक दबाव होते हैं, इस लिए उनकी सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। बढ़ते पैसों की कमी के साथ ही डर के आतंक के कारण पत्रकारों को नेताओं के पक्ष में खबरें लिखनी पड़ती हैं। इस स्थिति में दलाली जोरों पर रहती है। कई पत्रकार तुरंत पैसा कमाने के चक्कर में नेताओं के हाथ बिक जाते हैं।

ग्राम में पत्रकारों को उनकी जाति और धर्म के आधार पर भी मापा जाता है। कई बार उनकी आर्थिक स्थिति जैसे तत्व भी काम कर जाते हैं। ग्राम में पत्रकारिता करते वक्त अधिकांश लोग पत्रकारों की जाति, धर्म और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर मापते हैं अगर आप उनकी श्रेणी में हों तो बातें और खबरों दोनों का फायदा होता है और नहीं हो तो ये सब बड़ी चुनौतियां साबित होती हैं। इसी कारण मुख्यधारा के पत्रकारों की रिपोर्ट के मुकाबले ग्राम पत्रकारों की रिपोर्ट के गुणवत्ता में कमी दिखाई पड़ती है।

ग्रामीण स्तर पर कार्य करने वाले पत्रकारों को प्राथमिकता ना मिलना
पत्रकारिता के क्षेत्र में इस तरह के कई उदाहरण मौजूद हैं, जहां ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान ग्राम पत्रकारों को लोगों का सहयोग नहीं मिलता है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि उनका मेहनताना तक मिलना मुश्किल हो जाता है। गाँवों की कई ऐसी खबरें होती हैं जो राष्ट्रीय स्तर की बनती हैं। यह सब ग्राम पत्रकारों के कारण ही मुमकिन हो पाता है। कई बार तो पत्रकार को दी गई खबर के लिए कोई श्रेय भी नहीं मिलता है। राष्ट्रीय स्तर पर महत्व रखने वाली खबर पर भी छोटे पत्रकारों का नाम तक नहीं होता जो उस खबर को सबसे पहले उठाते हैं।

दुःखद बात यह है कि ग्रामीण भारत में पत्रकारिता व्यवस्थित नहीं है। संसाधनों की कमी के कारण 2014 में पी. साईनाथ ने एक प्रोजेक्ट ” पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया ” नाम से शुरू किया था। इसका उद्देश्य ग्रीन भारत पर एक पत्रिका निकालना था।

हालांकि, ग्रामीण पत्रकारों को उनकी कला और टैलेंट के आधार पर शोहरत पाने के लिए अभी लंबी लड़ाई लड़नी है। तब तक के लिए ग्रामीण भारत के पत्रकारों को ऊपरी दबाव, जात-पात, राजनीति और गरीबी से लड़ना होगा।

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